ज़िन्दगी मजबूर होती है कभी इतनी,
दूर तक कोई राह नहीं दिखती.
अपने जो लगते थे कभी,
करीब होते नहीं तभी.
समाँ वीरान होता है, वो जो शमा लगती थी कभी,
रोशन होती नहीं तभी.
सब कुछ जो हो रहा होता है, आसपास,
सामान्य लगता है हमेशा,
अजीब सा लगने लगता है तभी.
खुश है जीवन फ़िर भी, क्योंकी जनता हूँ,
पल भर का है ये सब.
क्षणभंगुर है.
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4 comments:
Gar jindagi hei kshanbhangur
To kya he bahut sochna,
Jee lo jee bharke
kal kisne dekha hei.
chandreshvyas007@rediffmail.com
Kya bataun mein kahan
Uhin chala jata hoon.
jo muje samje
uske pas chala
ja ta hun .
Haste gate jahan se nikal
Duniya ki tu parwa na kar.
Koi to hoga jo samaj paye
koi to hoga dhadkan mehsus kare.
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