Tuesday, November 15, 2005

क्षणभंगुर है

ज़िन्दगी मजबूर होती है कभी इतनी,
दूर तक कोई राह नहीं दिखती.

अपने जो लगते थे कभी,
करीब होते नहीं तभी.

समाँ वीरान होता है, वो जो शमा लगती थी कभी,
रोशन होती नहीं तभी.

सब कुछ जो हो रहा होता है, आसपास,
सामान्य लगता है हमेशा,
अजीब सा  लगने लगता है तभी.

खुश है जीवन फ़िर भी, क्योंकी जनता हूँ,
पल भर का है ये सब.
क्षणभंगुर है. 

4 comments:

Anonymous said...

Gar jindagi hei kshanbhangur
To kya he bahut sochna,
Jee lo jee bharke
kal kisne dekha hei.

chandreshvyas007@rediffmail.com

Anonymous said...

Kya bataun mein kahan
Uhin chala jata hoon.

jo muje samje
uske pas chala
ja ta hun .

Anonymous said...

Haste gate jahan se nikal
Duniya ki tu parwa na kar.

Anonymous said...

Koi to hoga jo samaj paye
koi to hoga dhadkan mehsus kare.