Sunday, January 03, 2021

खुदी पे बे-एतबारी का ग़ुलाम हूँ मैं

शोर है हर ओर, पर चुपचाप हूँ मैं,
अंदर ही अंदर गुटी, ज़िद्दी आवाज़ हूँ मैं.

हम-कदाओन की बेचैनी का रोज़ाना बढ़ता सबब,
रूहे-दर्द हूँ, जिनका चस्म ओ चिराग हूँ मैं.

अहले-मुस्तकबिल है कोई, तो कोई बे-मुकाम है,
नाउम्मीद सुफन, खुदी पे बे-एतबारी का ग़ुलाम हूँ मैं. 

Shor hai har aur, par chup chaap hoon main.
Andar hi andar guti, ziddi awaaz hoon main.

hum kadaon ki bechaini ka rozana badta sabab, 
ruh-e-dard hoon, jinka chashm-e-chiraag hoon main.

Ahle mustakbil hai koi, to koi be-mukaam hai,
Naumeed sufan, khudi pe be-aitbaari ka ghulaam hoon main.

Sunday, December 03, 2017

Lehren kitni bhi unchi kyon na ho, usse saagar ki gahrai ka naap nahin hota.
Jo kar chuka hoon kewal usse, meri khsamta ka gyan nahin hota.
Soch gehri hai meri, sapne vishal hai mere.
Kuch kshan kahin theher jaane se meri manzil ka anumaan nahin hota.

लहरें कितनी भी ऊँची क्यों न हो, उससे सागर की गहराई का नाप नहीं होता
जो कर चुका हूँ केवल उससे, मेरी क्षमता का ज्ञान नहीं होता.
सोच गहरी है मेरी, सपने विशाल है मेरे.
कुछ क्षण कहीं ठहर जाने से मेरी मंजिल का अनुमान नहीं होता.

Monday, September 05, 2016

Soch aur sacchai mein antar bade hote hain,  us antar ke alag jahan banaye jaate hain,
Khafa hone ke maksad nahin hote,  fir bhi aksar banaye jaate hain.
Waade karne aur nibhaane mein Fark hota hai,  Waade na nibhaane ke bahaane banaye jaate hain.
Hum mein tu aur Main ki hi jahan jagah nahin hoti, wahan 'woh' ke bhi aks banaye jaate hain.
Akele mein duniya alag hoti hai,  duniya mein apne akele banaye jaate hain.

Sunday, September 04, 2016

Umr kabhi ek pal, ek pal kabhi umr.
Sochta hoon waqt guzaroon kaise, 
Jab uski koi seema hai hi nahin.  

Subah hogi, vishwaas hai mujhe.
Par Raat ke andhere mein,
Kyon Subah ka koi ishara hai hi nahin.

Duvidha ki aandhi mein zarzar,
Shama ki lau bhi,
Kabhi hai kabhi hai hi nahin.

Haar maanane ki gunjayish nahin,
Parr Kaise rakhoon himmat barkaraar,
Jab nateeza bhi mere bas mein hai hi nahin.

Mustakbil hai mera yakeenan,
Kuch bhi nahin Kaise karoon main, 
Jab uske bina Baaki sab kuch, kuch bhi hai hi nahin. 

Monday, December 19, 2011

सोचता हूँ अगर
ये इश्क सा न हुआ होता,
अपने दरमियाँ
कुछ तो बचा होता.

हर एक बात पे,
न यूँ मैं खफा होता.
हर प्यार के एहसास पे.
न दर्द ही ज़रा होता.

धीरे धीरे न यूँ,
तू मुझसे जुदा होता.
न ये सोचता हर पल
की कभी न तुझसे मिला होता.


Tuesday, November 15, 2011

जहन में कोई कशमकश सी कहीं हैं,
समय और सब्र की फौजें रूबरू खड़ी हैं.
क्या लिखा है मुकम्मल जहाँ नसीब में,
इबादत मेरी एक बार फिर से दांव पे लगी है.

Friday, September 09, 2011

खाली खोखले रिश्तों की यह ढोलक,
शोर करती है, बजती है जब तक

रटती है तनहा आदमी के जिस्त की किताब 

बार बार मरम्मत की मारी,
कराहती हुई आवाज़,

सन्नाटे के शुन्य से बेहतर ही है शायद यह फिजूल-ए-साज़.

Monday, November 29, 2010

तू नहीं वो जो माईने हैं,
कोई नहीं तो तू सामने हैं.

तेरा अक्स तू है.
मुझे दिखते अलग आईने हैं.

नहीं तू और पास ना आ,
यूँ रोज़ ना मिल,
इस नशे से मुस्कुरा भी मत,
वो समय कुछ और था,
अब कुछ और ही ज़माने हैं.

फ़िर से वही दर्द ना हो.
फ़िर वही कशमकश  ना हो.
है रास्ते कहीं और
हाथ किसी और के 'सुफन' थामने हैं.

Wednesday, October 13, 2010

अपने ही देश को कभी अजनबी नज़रों से देखता हूँ मैं.

अच्छाइयों को तो महसूस करता ही हूँ मैं
कमियों को अक्सर सोचता हूँ मैं.

चिलचिलाती धुप में संव्लाते चेहरे देखते हूँ मैं
किसी को किसी की फ़िक्र कहाँ,
भीड़ के धक्कों में अपनेपन का ज़िक्र खोजता हूँ मैं.

ज़द्दोजाहत-ए-ज़िन्दगी में कल का अक्स है कहीं.
वाहनों की रफ़्तार से सपनो की भूमिका को मापता हूँ मैं.

कभी शर्म कभी गर्व महसूस करता हूँ मैं.
अपने देश को कभी अजनबी नज़रों से देखता हूँ मैं

Sunday, August 08, 2010

फ़िर से आज शाम कशमकश की,
तन्हा दिन रहा, शब्-ए-तन्हाई अभी बाकि.

लिख रहा था मुहब्बत का अफसाना एक और,
फ़िर कलम-ए-तदबीर की नोक चटकी.

उल्फत के मुक़र्रर थे सपने,
बेमिसाल थी बज़्म-ए-ख्याल की बारीकी.
उम्र जी लेता उस पल में मैं,
कमबख्त किस्मत की वही बदसुलूकी.

समझा, मिल गयी मुहब्बत-ए-'सुफन'.
पर फ़िर से वही मुगालते दिल-ए-बैचैन की

Sunday, August 01, 2010

भावनाएं जोड़ एहसास उभर आया है, और
एहसासों ने तराशा है तेरा तसव्वुर  रूबरू .
अब के कशमकश- ए- 'सुफन' ये है के
तलब-- आशिकी तू है या तेरे तसव्वुर की मुझे आरज़ू.

Wednesday, June 23, 2010

नहीं, तड़पता नहीं उस तरह से अब,
बिखरता नहीं हर याद पे बेबस.
हो गए थे फ़ना अब तलक, शुक्र है
लड़ता नहीं वक़्त से दर्द देर तक.

Monday, April 05, 2010

खुद-फरोशी

ना दिल रहा, ना दोस्ती रही
ना घर  ना वह बस्ती रही.
ख़ाक तो हो ही गया था जो भी
कुछ ना रहा, खुद-फरोशी रही

एक बात थी, अब याद नहीं
तू था, में था और ख़ामोशी कहीं.
एक दिन रही, और रहती रही.
फ़िर कुछ ना रहा बा-खुद-फरोशी रही

क्यों ना रहे अलहिदा ही सही,
जियें क्यों ना ऐसे खफा ही सही,
रहते रहे और क्यों ना रहे
कुछ और ना सही खुद-फरोशी सही

Thursday, March 25, 2010

ना करे कोई क़द्र, तो क्या है,
न मिले हमज़बाँ कोई, तो क्या है.

ना हो कोई सुकून-ए-बज़्म तो क्या है,
ना बने फिर दास्तान कोई तो क्या है.

माना ना खुशफहम हूँ मैं,
ना शान-ए-महफ़िल भी कोई,
ता-उम्र यूँ भी जाये तो क्या है.

हैं कमियाँ मुझमें बेपनाह बेशक,
मैं मैं ही हूँ - और क्या है.

Monday, February 08, 2010

 जब चाहते हैं दोनों मेरा भला ही तो
दिल और दिमाग मैं यह अनबन क्यों?

जब हो ही गया है निश्चय तो
बार बार यह संशय क्यों?

हर राह में हैं, फूल और कांटें भी

जब चल ही पड़े हैं एक थोर तो
हर मोड़ पे वही मंथन क्यों?

जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है ना?
बेबात दिल की तेज़ है फिर धड़कन क्यों?

Tuesday, February 02, 2010

यह पल

जी का जंजाल है यह पल.

अभी अभी तो बिताया था,
देखो फिर आ गया यह पल.

रात को देर तलक बैठा था,
सुबह पहले पहर चला आया यह पल.

क्यों है तू? क्या है तू?
बेमतलब के इन सवालों का वकील है यह पल.

जी लेता इसको, क्या फरक पड़ता है,
था या नहीं था यह पल.

मगर कुछ और नहीं,
किसी के ना होने का एहसास है यह पल.

मेरी तन्हाई का खुलासा है यह पल,

जी का जंजाल है यह पल.

Monday, January 25, 2010

कभी सपना था वो हकीकत बन रहा है,
बे-सब्र बहती धारों से साहिल बन रहा है |

किसी का ना होना अब आरज़ू बन रहा है,
सुबह से शाम भर जीना, रोज़ाना बन रहा है|

माना की अभी मंज़िल नहीं मिली, कोई गुलशन नहीं बना,
कम से कम इस बार वीराने में सऱाब तो बन रहा है|







Friday, December 04, 2009

लो फ़िर एक नया मुकाम आ गया
कैसे गुज़र गया कल, और आज आ गया
इंसान तो मैं वो ही हूँ,
परत दर परत नया अंदाज़ आ गया

एक पल ही जैसे गुजरा है, 
मैं कहाँ से कहाँ आ गया.
ना जाने कैसी यह तलाश है,
शहर से चला था गाँव आ गया



Friday, September 25, 2009

हर कदम का अब कद कम है,
ज़बान में अब मद कम है
गुज़र जो गया है वक़्त इतना,
ज़हन में अब गम कम है.

Sunday, March 22, 2009

कब जुड़ेंगे ये दिल के टुकड़े,
कब मिटेंगे ये जख्मों के धब्बे,
कबसे चल रहा हूँ यूँ गिड़ते पड़ते,
कब भरेंगे ये राहों के गड्ढे.