Thursday, March 25, 2010

ना करे कोई क़द्र, तो क्या है,
न मिले हमज़बाँ कोई, तो क्या है.

ना हो कोई सुकून-ए-बज़्म तो क्या है,
ना बने फिर दास्तान कोई तो क्या है.

माना ना खुशफहम हूँ मैं,
ना शान-ए-महफ़िल भी कोई,
ता-उम्र यूँ भी जाये तो क्या है.

हैं कमियाँ मुझमें बेपनाह बेशक,
मैं मैं ही हूँ - और क्या है.

Monday, February 08, 2010

 जब चाहते हैं दोनों मेरा भला ही तो
दिल और दिमाग मैं यह अनबन क्यों?

जब हो ही गया है निश्चय तो
बार बार यह संशय क्यों?

हर राह में हैं, फूल और कांटें भी

जब चल ही पड़े हैं एक थोर तो
हर मोड़ पे वही मंथन क्यों?

जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है ना?
बेबात दिल की तेज़ है फिर धड़कन क्यों?

Tuesday, February 02, 2010

यह पल

जी का जंजाल है यह पल.

अभी अभी तो बिताया था,
देखो फिर आ गया यह पल.

रात को देर तलक बैठा था,
सुबह पहले पहर चला आया यह पल.

क्यों है तू? क्या है तू?
बेमतलब के इन सवालों का वकील है यह पल.

जी लेता इसको, क्या फरक पड़ता है,
था या नहीं था यह पल.

मगर कुछ और नहीं,
किसी के ना होने का एहसास है यह पल.

मेरी तन्हाई का खुलासा है यह पल,

जी का जंजाल है यह पल.

Monday, January 25, 2010

कभी सपना था वो हकीकत बन रहा है,
बे-सब्र बहती धारों से साहिल बन रहा है |

किसी का ना होना अब आरज़ू बन रहा है,
सुबह से शाम भर जीना, रोज़ाना बन रहा है|

माना की अभी मंज़िल नहीं मिली, कोई गुलशन नहीं बना,
कम से कम इस बार वीराने में सऱाब तो बन रहा है|







Friday, December 04, 2009

लो फ़िर एक नया मुकाम आ गया
कैसे गुज़र गया कल, और आज आ गया
इंसान तो मैं वो ही हूँ,
परत दर परत नया अंदाज़ आ गया

एक पल ही जैसे गुजरा है, 
मैं कहाँ से कहाँ आ गया.
ना जाने कैसी यह तलाश है,
शहर से चला था गाँव आ गया



Friday, September 25, 2009

हर कदम का अब कद कम है,
ज़बान में अब मद कम है
गुज़र जो गया है वक़्त इतना,
ज़हन में अब गम कम है.

Sunday, March 22, 2009

कब जुड़ेंगे ये दिल के टुकड़े,
कब मिटेंगे ये जख्मों के धब्बे,
कबसे चल रहा हूँ यूँ गिड़ते पड़ते,
कब भरेंगे ये राहों के गड्ढे.

Monday, October 20, 2008

क्यों फ़िर दिल लगाने को उकसाती हो -जैसे,
हशं क्या है, ना जानती हो.

ख्वाब देखने को इसरार करती हो कैसे,
जब शब् ओ रोज़, नींद ना आती हो.

जानता हूँ, भर जायेंगे ये  ज़ख्म वक़्त में.
इल्म है, गुज़र जाएगी एक उम्र किस तरह भी,
पर बताओ ज़ख्मो भरे दिल को,
इस पल के लिए ही कैसे तुम सहलाती हो?

क्या होगा करीब कोई कल में,
क्या होगा दिल खुश उस पल में,
क्या कहती हो, ये सच होगा,
या फ़कत दिल को तुम बहलाती हो?

Tuesday, October 14, 2008

इस दर्द की कोई दवा नहीं,
गमजदा हूँ और कोई दुआ नहीं.

जम गया है बर्फ की तरह,
ख़याल तेरा जिगर के  इर्दगिर्द.
सुन्न सा है दिल,
मुहब्बत की कोई आरजू नहीं.

अब खुद से ही हूँ, अतराफ कोई नहीं,
जी रहा हूँ, शामिल कोई और वजह नहीं.

Wednesday, October 08, 2008

दर्द इतना बढ़ गया की,
शायरी अब लिखी नहीं जाती 
अंगारे अभी गरम हैं और 
भावनाओं को आंधी दी नहीं जाती.

डरते हैं, लिखे क्या,
की कब्रें ऐसे ही कुरेदी नहीं जाती 
दफ़्न हैं कई गम ऐसे और
कई आरजुएं बेज़ार
जिनकी सांसें अब तलक नहीं जाती.

Monday, June 23, 2008

भावनाओं में इतना कस गया,
की दम ही घुटने लगा.

मन  के तालाब में ऐसा भंवर चला,
इकलौता बाँध भी टूटता रहा.

इछाओं का बोझ बढता ही गया,
सपनो का महल वहीँ ढहने लगा.

रिश्ते का धागा इस तरह खींचता गया.
एक वार में ही वह चटक गया.

और किसी कमजोरी की गुंजाईश ना रही,
जो रब्त-ओ- बुत- ए-पाक ही बहक गया.

Tuesday, May 27, 2008

चार पल हैं जीवन के, फ़िर भी
सहता है दर्द इंसान पल पल क्यों?

कल शाम को ठीक था,
आज फ़िर दुखी है मन इतना क्यों?

रिश्तों का ये मायाजाल.
फस गया आखिर इतना गहरा क्यों?

आता है अकेला आदमी, जाता है अकेला,
अकेलेपन से डर गया फ़िर क्यों?

Saturday, May 24, 2008

जिस मोड़ पे आ गए हैं,
कई सुर्ख राहें नज़र आती हैं
मंजिलें दूर तलक जाती है,
और कदम थमते नज़र आते हैं

पीछे जिन राहों में जो सुकून छोड़ आये हैं,
मुड़ मुड़ कर उसे देखने रुक जाते हैं
बेमंन से कल की तरफ देखते हैं,
भारी क़दमों से फिर चल पड़ते हैं

अपनों की जो पल पल परिभाषा बदल रहे हैं,
इसी बीच कुछ अपनों को पराया कर चले जाते हैं
तड़पते हैं, छटपटाते हैं,
कुछ बंधनों को थामने के लिए,
कुछ की बलि चडाते हैं.

ना जीते हैं ना मरते हैं
दिशाहीन से किसी थोर बड़े चले जाते हैं.
-
जिस मोड़ पे आ गए हैं,
कई सुर्ख राहें नज़र आती हैं.

Thursday, December 27, 2007

dost, tumhe yaad kiye jaate hain

जाने कैसी हवाएं हैं ये,
जिनमे पुराने पल खोते जाते हैं.
जो लोग दिल के करीब होते हैं इतने कभी,
वो दूर नज़र के होते जाते हैं.

जिनका जिक्र जुबान से रुकता नहीं था,
याद करने पर भी वो नाम भूले जाते हैं.
होश में हूँ या बेहोश हूँ,
अक्सर ऐसे शक खुदी पर हम किये जाते हैं.

लगता है डर, सोचता हूँ में.
क्या ऐसे ही मरासिम छोड़ते जाते हैं.
दिल से बनायीं दुनिया को,
लम्हा लम्हा, ऐसे ही तोड़ते जाते हैं?

---खफा ना होना दोस्त, खातागार हम,
ज़हन में ही सही, तुम्हे अक्सर याद किये जाते हैं

Thursday, December 06, 2007

रिश्ते क्यों यूँ ही नम हो जाते हैं,
क्यों छोटी गलतफहमियों में खो जाते हैं.
भावनाओं के समंदर दर्द से रो जाते हैं,
मुस्कुराते हुए दो चेहरे
एक ही छत के नीचे गुमसुम से हो जाते हैं.

Monday, September 10, 2007

खाली खाली सा है, दिल के हर कोने में.
आँखें  भारी भारी हैं, तकलीफ है फ़िर भी सोने में.

बेमतलब करता रहा कुछ भी, दिनभर
क्या फरक है मुझमे और खिलोने में.

गम बार बार मिलते रहे,
मज़ा आने लगा है मुझे अब रोने में.

कोई आरज़ू नहीं, कोई जुस्तजू नहीं.
कुछ अलग नहीं होने या ना होने में.

Monday, August 20, 2007

या तो मैं बेपरवाह ही होता, या यूँ कमजोर नहीं होता,
या तो मैं आवारा ही होता, या यूँ तुझसे प्यार ना होता.
तेरी ख्वाहिश भी रखता हूँ, तुझे मैं पा नहीं सकता,
कैसी कशमकश है ज़िन्दगी, खुदी की है खुद जी नहीं सकता.

Friday, July 06, 2007

डर गया हूँ प्यार से कुछ इस तरह मैं,
किसी की निगाहें तलाशता ही नहीं हूँ मैं.
खुदी से जी लूँगा इसका ऐतबार है अब,
किसी रब्त को तवज्जोह देता ही नहीं हूँ मैं.

इधर उधर से निकल आता है तेरी यादों का लश्कर,
डरा डरा सा यूँ ही गुज़र जाता हूँ मैं उससे.
तबाह होते हैं कुछ पल और कई आरजुएं बेज़ार.
इसी तरह दफ़्न होता जाता हूँ
कतरा कतरा मैं अपनी ही कब्र में.

Sunday, March 11, 2007

paisa chahiye yaar

Kabhi sochta hoon...
hota mere ghar bhi,
paison ka ambaar.

din guzarte alag,
alag hota yeh sansaar.

Mushkilein kuch aur hoti,
kuch aur hota karaar.

na rehte hamesha yun haath tang,
na hota koi sahukaar.

bada sa hota ghar,
aur usme hota ek bar.

dukaney kam lagti,
kapde hote hazaar.

jab aarzoo hoti jahan chala jata,
chota sa lagta yeh sansaar.

na sabkuch hai, na hai pyaar.
parr fir bhi paisa chahiye yaar.

Friday, March 09, 2007

khush rehna zaroori hai

थक गए तुम भले ही,
उठा के सर चलना ज़रूरी है.

ना मिलें हो फल कभी भी,
करते रहना कर्म ज़रूरी है.

बल ना हो बाँहों में फ़िर भी,
वीरता मन में ज़रूरी है.

परिश्रम कर लिया बहुत तुमने,
पर हाँ थोडा और ज़रूरी है.

हो ना कोई भी साथ,
भरोसा खुद पे ज़रूरी है.

मुश्किलें तो हर किसी को हैं,
बस खुश रहना ज़रूरी है.